भगवान शिव के मस्तक पर चंद्रमा क्यों है?
बहुत समय पहले की बात है। प्रजापति दक्ष की 27 पुत्रियाँ थीं। इन सभी का विवाह चंद्रदेव से हुआ था।
ये 27 पुत्रियाँ वास्तव में 27 नक्षत्रों का स्वरूप मानी जाती हैं।
चंद्रदेव की सभी पत्नियाँ उनसे प्रेम करती थीं, लेकिन चंद्रदेव को रोहिणी सबसे अधिक प्रिय थी।
वह अपना अधिकांश समय रोहिणी के साथ ही बिताते थे और बाकी पत्नियों की उपेक्षा करते थे।
इससे उनकी अन्य पत्नियाँ बहुत दुखी हुईं। वे अपने पिता प्रजापति दक्ष के पास गईं और अपनी पीड़ा बताई।
दक्ष ने चंद्रदेव को समझाया—
“चंद्रदेव! तुम्हें अपनी सभी पत्नियों के साथ समान व्यवहार करना चाहिए।”
लेकिन चंद्रदेव ने दक्ष की बात नहीं मानी।
यह देखकर प्रजापति दक्ष बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने चंद्रदेव को श्राप दे दिया—
“तुम्हारा तेज दिन-प्रतिदिन कम होता जाएगा और तुम्हारी कांति नष्ट हो जाएगी!”
दक्ष के श्राप का प्रभाव तुरंत दिखाई देने लगा।
चंद्रदेव का प्रकाश धीरे-धीरे कम होने लगा। उनका तेज समाप्त होने लगा और वे बहुत दुखी हो गए।
उन्होंने देवताओं से सहायता मांगी।
तब उन्हें भगवान शिव की आराधना करने की सलाह दी गई।
चंद्रदेव ने एक पवित्र स्थान पर जाकर भगवान शिव का ध्यान करना शुरू किया।
उन्होंने लंबे समय तक कठोर तपस्या की।
चंद्रदेव की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव उनके सामने प्रकट हुए।
भगवान शिव ने कहा—
“हे चंद्र! मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूं। तुम चिंता मत करो।”
चंद्रदेव ने भगवान शिव से प्रार्थना की—
“हे महादेव! मुझे इस श्राप से मुक्ति प्रदान कीजिए।”
तब भगवान शिव ने कहा—
“दक्ष का श्राप पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकता, लेकिन मैं तुम्हें वरदान देता हूं कि तुम एक पक्ष में धीरे-धीरे क्षीण होगे और दूसरे पक्ष में फिर से बढ़ते जाओगे।”
इसके बाद भगवान शिव ने चंद्रदेव को अपने मस्तक पर धारण कर लिया।
इसी कारण भगवान शिव को “चंद्रशेखर” कहा जाता है।
तब से चंद्रमा भगवान शिव के मस्तक की शोभा बढ़ाता है। चंद्रमा का घटना और बढ़ना भी इसी कथा से जोड़ा जाता है।
🙏 कहानी की सीख
इस कहानी से हमें सीख मिलती है कि अहंकार और पक्षपात रिश्तों में दुख पैदा कर सकते हैं।
लेकिन सच्ची भक्ति, विनम्रता और भगवान पर विश्वास से कठिन परिस्थितियों में भी आशा की किरण मिलती है।
हर अंधेरी रात के बाद उजाला जरूर आता है।
🔱 ॐ नमः शिवाय।
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