पूरा शहर अभी ठीक से जागा भी नहीं था, लेकिन स्कूल के मैदान में तिरंगा फहराने की तैयारी शुरू हो चुकी थी। कहीं बच्चे सफेद कपड़ों में दौड़ रहे थे, कहीं लाउडस्पीकर की आवाज़ आ रही थी और कहीं दुकानों के बाहर छोटे-छोटे तिरंगे सजाए जा रहे थे।
आज 15 August था।
आरव नाम का एक 16 साल का लड़का अपने स्कूल के लिए तैयार हो रहा था।
उसने जल्दी से सफेद कुर्ता पहना, बाल ठीक किए और आईने में खुद को देखकर बोला—
“आज तो Instagram पर मेरी patriotic photo पक्की जाएगी!” 😄
माँ ने पीछे से आवाज़ लगाई—
“पहले नाश्ता कर ले, फिर देशभक्ति करना!”
आरव हँसते हुए बोला—
“माँ, आज Independence Day है!”
माँ मुस्कुराईं।
“हाँ बेटा… लेकिन देशभक्ति सिर्फ आज नहीं होती।”
आरव ने उस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया।
वह स्कूल पहुँच गया।
वहाँ बच्चे तिरंगे के साथ photos ले रहे थे। कोई “Jai Hind” बोलकर Reel बना रहा था, तो कोई अपनी नई DP के लिए perfect pose ढूँढ रहा था।
आरव भी अपने दोस्तों के साथ फोटो लेने लगा।
तभी उसकी नजर स्कूल के पुराने store room के पास रखे एक बड़े तिरंगे पर पड़ी।
वह तिरंगा थोड़ा पुराना था।
किनारे से हल्का-सा फटा हुआ।
आरव ने उसे उठाया और सोचने लगा—
“इसे नया क्यों नहीं कर देते?”
उसने तिरंगे को हाथ में लिया।
और तभी…
उसे लगा जैसे किसी ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—
“क्या मैं तुम्हें पुराना लगता हूँ?”
आरव अचानक पीछे मुड़ा।
वहाँ कोई नहीं था।
उसने डरते हुए पूछा—
“क… कौन?”
फिर वही आवाज़ आई—
“मैं।”
आरव की नजर उसके हाथ में पकड़े तिरंगे पर गई।
उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।
“तुम… बोल रहे हो?”
तिरंगा हवा में हल्का-सा लहराया।
“हाँ।”
आरव कुछ सेकंड तक कुछ बोल ही नहीं पाया।
फिर उसने पूछा—
“लेकिन… तुम बोल कैसे सकते हो?”
तिरंगे ने जवाब दिया—
“जिस देश के करोड़ों लोगों की उम्मीदें मैंने अपने अंदर समेटी हों… उसकी कहानी सुनाने के लिए आवाज़ की जरूरत नहीं होती।”
आरव चुप हो गया।
तिरंगा आगे बोला—
“तुम लोग मुझे साल में कुछ दिनों के लिए याद करते हो।”
“15 August…”
“26 January…”
“और फिर मुझे अलमारी में रख देते हो।”
आरव ने धीरे से कहा—
“ऐसा नहीं है…”
तिरंगा बोला—
“तो बताओ… आज तुम्हारी सबसे पहली चिंता क्या है?”
आरव मुस्कुराया।
“Photo अच्छी आनी चाहिए।”
तिरंगा भी जैसे मुस्कुराया।
“और देश?”
आरव के पास कोई जवाब नहीं था।
तिरंगे ने अपनी कहानी शुरू की।
“मैंने बहुत कुछ देखा है।”
“कभी मेरे लिए लोगों ने अपने घर छोड़े।”
“कभी अपने परिवार।”
“कभी अपनी जिंदगी तक।”
“उन्होंने बदले में कुछ नहीं माँगा।”
आरव ध्यान से सुन रहा था।
“लेकिन आज…”
तिरंगे की आवाज़ थोड़ी धीमी हो गई।
“आज कई लोग मुझे हाथ में लेकर सिर्फ photo खिंचवाते हैं।”
“मेरे नाम पर status लगाते हैं।”
“लेकिन सड़क पर पड़े कचरे को देखकर आगे बढ़ जाते हैं।”
“किसी जरूरतमंद को देखकर नजरें फेर लेते हैं।”
“ईमानदारी से काम करने की जगह shortcut ढूँढते हैं।”
आरव की नजर नीचे झुक गई।
तिरंगे ने पूछा—
“क्या तुम्हें पता है कि असली आज़ादी क्या है?”
आरव बोला—
“अंग्रेजों से आज़ादी?”
तिरंगा बोला—
“वह तो इतिहास है।”
“आज की आज़ादी है…”
“डर से आज़ादी।”
“नफरत से आज़ादी।”
“भेदभाव से आज़ादी।”
“झूठ से आज़ादी।”
“और सबसे जरूरी…”
“अपने अंदर की बुराई से आज़ादी।”
आरव की आँखों में अब चमक नहीं थी।
वह सोच में पड़ चुका था।
कुछ देर बाद स्कूल में Independence Day समारोह शुरू हुआ।
प्रधानाचार्य ने भाषण दिया।
बच्चों ने देशभक्ति गीत गाए।
फिर आरव को मंच पर बुलाया गया।
उसके हाथ में वही पुराना तिरंगा था।
पूरा मैदान तालियों से गूँज उठा।
आरव ने माइक पकड़ा।
उसने अपना तैयार किया हुआ भाषण निकालना चाहा।
लेकिन फिर उसने कागज मोड़कर जेब में रख दिया।
और बोला—
“आज मैं आपको कोई याद किया हुआ भाषण नहीं सुनाऊँगा।”
पूरा मैदान शांत हो गया।
“आज सुबह मैंने तिरंगे से बात की।”
बच्चे हँसने लगे।
लेकिन आरव गंभीर था।
उसने कहा—
“उसने मुझसे पूछा कि मैं उसे सिर्फ आज क्यों याद करता हूँ?”
“मेरे पास जवाब नहीं था।”
“फिर उसने पूछा कि अगर हम सच में आज़ाद हैं, तो क्या हम अपने गुस्से से आज़ाद हैं?”
“क्या हम अपनी नफरत से आज़ाद हैं?”
“क्या हम भेदभाव से आज़ाद हैं?”
“क्या हम गलत देखकर चुप रहने की आदत से आज़ाद हैं?”
अब पूरा मैदान बिल्कुल शांत था।
आरव ने तिरंगे की तरफ देखा।
“मुझे लगता है…”
“देश से प्यार सिर्फ तिरंगा हाथ में लेने से नहीं होता।”
“देश से प्यार तब होता है…”
“जब हम अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाते हैं।”
तालियाँ बजने लगीं।
इस बार तालियाँ सिर्फ भाषण के लिए नहीं थीं।
लोगों के चेहरों पर कुछ बदल गया था।
समारोह खत्म हुआ।
आरव वापस उसी store room के पास गया।
वही तिरंगा वहाँ था।
उसने उसे बहुत सम्मान से उठाया।
“धन्यवाद…”
हवा चली।
तिरंगा लहराया।
और आखिरी बार आवाज़ आई—
“मुझे संभालकर रखना।”
आरव ने पूछा—
“तुम्हें?”
तिरंगे ने कहा—
“नहीं… उस भारत को, जिसका सपना मेरे रंगों में छिपा है।”
आरव की आँखों में आँसू आ गए।
उसने तिरंगे को अपने सीने से लगा लिया।
अगले दिन से आरव बदल गया।
उसने सड़क पर कचरा देखा तो उठाया।
स्कूल में नए बच्चे को अकेला देखा तो उससे दोस्ती की।
किसी को उसकी भाषा या कपड़ों की वजह से मज़ाक बनते देखा तो उसके साथ खड़ा हुआ।
और जब भी कोई उससे पूछता—
“तुम इतना सब क्यों करते हो?”
वह मुस्कुराकर बस इतना कहता—
आखिरी सवाल
शायद अगर आज हमारा तिरंगा सच में हमसे बात कर पाता…
तो वह हमसे भी यही पूछता—
“तुम मुझे कितनी बार हाथ में लेते हो?”
नहीं।
शायद वह पूछता—
“तुम मेरे देश के लिए कितनी बार सही काम करते हो?”
क्योंकि तिरंगे की असली इज्जत उसे आसमान में ऊँचा रखने से ही नहीं…
बल्कि उस देश को बेहतर बनाने से होती है, जिसके लिए वह लहराता है।