वह कमरा जो हर रात खुल जाता था |
रहस्यमयी हिंदी कहानी
वह कमरा जो हर रात खुल जाता था
शहर से करीब 20 किलोमीटर दूर एक पुरानी हवेली थी। हवेली कई सालों से बंद पड़ी थी। आसपास रहने वाले लोग उस हवेली के बारे में ज्यादा बात नहीं करते थे।
कहा जाता था कि हवेली के अंदर एक ऐसा कमरा था, जिसका दरवाजा दिन में हमेशा बंद रहता था।
लेकिन रात के ठीक 12 बजे वह दरवाजा अपने आप खुल जाता था।
लोगों का मानना था कि उस कमरे में जाने वाला व्यक्ति कभी वापस नहीं लौटता।
अधिकतर लोग इस बात को सिर्फ एक अफवाह मानते थे।
लेकिन आरव अफवाहों पर विश्वास नहीं करता था।
हवेली का रहस्य
आरव एक युवा पत्रकार था। उसे पुरानी और रहस्यमयी जगहों के बारे में जानकारी जुटाने का शौक था।
एक दिन उसे इस हवेली के बारे में पता चला।
उसने गांव के एक बुजुर्ग से पूछा—
“बाबा, आखिर इस हवेली में ऐसा क्या हुआ था?”
बुजुर्ग ने कुछ देर तक आरव को देखा।
फिर बोले—
“बेटा, उस हवेली में कभी एक बहुत अमीर परिवार रहता था। परिवार में पति-पत्नी और उनकी एक छोटी बेटी थी।”
“फिर क्या हुआ?”
बुजुर्ग की आवाज धीमी हो गई।
“एक रात अचानक तीनों गायब हो गए।”
आरव हैरान रह गया।
“गायब? मतलब?”
“घर के दरवाजे अंदर से बंद थे। सामान वहीं था। खाना मेज पर रखा था। लेकिन परिवार का कोई सदस्य नहीं मिला।”
आरव ने पूछा—
“और वह कमरा?”
बुजुर्ग ने तुरंत उसकी तरफ देखा।
“उस कमरे के बारे में मत पूछो।”
आधी रात का इंतजार
आरव ने उसी रात हवेली में जाने का फैसला किया।
रात के करीब 11:30 बजे वह हवेली के अंदर पहुंच गया।
पुराने फर्नीचर पर धूल जमी थी। दीवारों पर लगी तस्वीरें धुंधली हो चुकी थीं।
उसने मोबाइल की टॉर्च जलाई।
तभी उसे ऊपर की मंजिल से किसी बच्चे के हंसने की आवाज सुनाई दी।
“ही... ही... ही...”
आरव रुक गया।
उसने खुद को समझाया कि शायद कोई बिल्ली होगी।
लेकिन आवाज दोबारा आई।
इस बार बिल्कुल साफ।
एक बच्ची हंस रही थी।
आरव सीढ़ियां चढ़कर ऊपर पहुंचा।
वहां एक लंबा गलियारा था।
गलियारे के आखिरी हिस्से में एक लकड़ी का दरवाजा था।
दरवाजे पर पुराने अक्षरों में लिखा था—
“अंदर आना मना है।”
आरव ने घड़ी देखी।
11:59 PM
उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।
ठीक 12 बजते ही...
चर्ररर...
दरवाजा अपने आप खुल गया।
आरव कुछ सेकंड तक वहीं खड़ा रहा।
फिर उसने मोबाइल की टॉर्च कमरे के अंदर की।
कमरे में सिर्फ एक पुरानी कुर्सी, एक मेज और दीवार पर लगी एक बड़ी तस्वीर थी।
तस्वीर देखकर आरव के पैरों तले जमीन खिसक गई।
तस्वीर में वही परिवार था जिसके बारे में बुजुर्ग ने बताया था।
लेकिन तस्वीर में एक चौथी जगह खाली थी।
ऐसा लग रहा था जैसे वहां किसी व्यक्ति की तस्वीर होनी चाहिए थी।
तभी मेज पर रखा एक पुराना कागज नीचे गिरा।
आरव ने उसे उठाया।
उस पर लिखा था—
“हम तीन नहीं थे।”
आरव की धड़कन तेज हो गई।
तभी कमरे का दरवाजा जोर से बंद हो गया।
धड़ाम!
आरव ने दरवाजा खोलने की कोशिश की।
दरवाजा नहीं खुला।
फिर उसे पीछे से किसी बच्ची की आवाज सुनाई दी—
“आप भी हमें ढूंढने आए हो?”
आरव धीरे-धीरे पीछे मुड़ा।
कमरे के कोने में एक छोटी बच्ची खड़ी थी।
उसने सफेद रंग की पुरानी फ्रॉक पहन रखी थी।
उसका चेहरा नीचे झुका हुआ था।
आरव ने कांपती आवाज में पूछा—
“तुम कौन हो?”
बच्ची ने अपना चेहरा ऊपर उठाया।
और मुस्कुराकर बोली—
“मैं इस घर की आखिरी बेटी हूं।”
आरव ने तस्वीर की तरफ देखा।
तस्वीर में वही बच्ची थी।
लेकिन तस्वीर पर उसकी मौत की तारीख लिखी थी—
17 जुलाई 1986।
आरव के हाथ से मोबाइल गिर गया।
बच्ची धीरे-धीरे उसके करीब आने लगी।
“आपको सच जानना है?”
आरव पीछे हटने लगा।
“कौन सा सच?”
बच्ची ने दीवार की तरफ इशारा किया।
दीवार पर अचानक एक दरार दिखाई दी।
दरार धीरे-धीरे बड़ी होती गई।
और उसके पीछे एक छोटा-सा गुप्त कमरा दिखाई दिया।
कमरे के अंदर तीन कंकाल पड़े थे।
आरव की आंखें खुली रह गईं।
बच्ची ने कहा—
“मेरे माता-पिता ने हमें नहीं छोड़ा था।”
“तो फिर?”
बच्ची मुस्कुराई।
“उन्हें किसी ने बंद किया था।”
आरव ने पूछा—
“किसने?”
बच्ची ने धीरे से उसकी तरफ देखा।
फिर बोली—
“जिसने यह हवेली खरीदी थी।”
आरव के चेहरे का रंग उड़ गया।
क्योंकि वह हवेली...
जिस कंपनी के लिए वह पत्रकारिता कर रहा था...
उसी कंपनी के मालिक ने खरीदी थी।
तभी उसके मोबाइल की स्क्रीन अपने आप जल उठी।
स्क्रीन पर एक नया संदेश था—
“आरव, तुम्हें वहां नहीं जाना चाहिए था।”
आरव ने कांपते हुए पूछा—
“यह मैसेज किसने भेजा?”
बच्ची ने जवाब दिया—
“जिसने मेरे परिवार को मारा था।”
अचानक कमरे की सारी लाइटें जल उठीं।
बच्ची गायब थी।
दरवाजा खुला हुआ था।
आरव भागते हुए हवेली से बाहर निकल आया।
अगली सुबह उसने पूरी घटना पुलिस को बताई।
पुलिस हवेली में पहुंची।
गुप्त कमरे से तीन कंकाल मिले।
लेकिन सबसे बड़ा रहस्य तब सामने आया जब पुलिस को वहां एक पुरानी डायरी मिली।
डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखा था—
“अगर कोई इस कमरे तक पहुंच गया है, तो अब अगली बारी उसकी है।”
डायरी के नीचे एक नाम लिखा था।
वही नाम...
आरव का।
उस रात के बाद आरव ने उस हवेली के बारे में कभी कोई कहानी नहीं लिखी।
लेकिन गांव के लोग आज भी कहते हैं कि हर रात ठीक 12 बजे हवेली की ऊपरी मंजिल का दरवाजा खुलता है।
और कभी-कभी वहां से एक बच्ची की आवाज सुनाई देती है—
“अगली कहानी किसकी होगी?”
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