आखिरी तस्वीर
शहर के पुराने हिस्से में एक छोटी-सी फोटो स्टूडियो की दुकान थी—“राहुल फोटो आर्ट”।
दुकान का मालिक राहुल पिछले दस साल से लोगों की तस्वीरें खींच रहा था। शादी हो, जन्मदिन हो या पासपोर्ट फोटो—हर तरह की तस्वीर उसके कैमरे में कैद होती थी।
लेकिन एक रात उसके साथ कुछ ऐसा हुआ, जिसने उसकी पूरी जिंदगी बदल दी।
उस रात लगभग साढ़े ग्यारह बजे राहुल दुकान बंद करने वाला था। बाहर तेज बारिश हो रही थी। तभी उसकी नजर कैमरे की स्क्रीन पर पड़ी।
स्क्रीन पर एक तस्वीर खुली हुई थी।
राहुल कुछ सेकंड तक उसे देखता रहा।
तस्वीर में शहर की पुरानी “सूरज हवेली” दिखाई दे रही थी।
हवेली पिछले पंद्रह साल से बंद थी।
राहुल ने भौंहें सिकोड़ लीं।
“ये फोटो मैंने कब खींची?”
उसने कैमरे की पिछली तस्वीरें देखीं। हवेली वाली तस्वीर के ठीक पहले उसने एक ग्राहक की तस्वीर खींची थी। उसके बाद कोई दूसरी फोटो नहीं थी।
फिर यह तस्वीर आई कहां से?
राहुल ने तस्वीर को Zoom किया।
हवेली की दूसरी मंजिल की खिड़की में एक आदमी खड़ा था।
चेहरा साफ नहीं था, लेकिन कपड़े साफ दिखाई दे रहे थे—काली शर्ट और सफेद जैकेट।
राहुल का दिल अचानक तेज धड़कने लगा।
वह जैकेट उसे पहचान में आ रही थी।
क्योंकि बिल्कुल ऐसी ही जैकेट उसके बड़े भाई अमित पहनते थे।
अमित की मौत तीन साल पहले एक सड़क दुर्घटना में हो चुकी थी।
राहुल ने खुद को समझाया कि यह सिर्फ उसका भ्रम है।
उसने कैमरा बंद किया और घर चला गया।
लेकिन पूरी रात उसे नींद नहीं आई।
अगली सुबह उसने तस्वीर अपने दोस्त समीर को दिखाई।
समीर कुछ देर तक तस्वीर को देखता रहा।
“तुम्हें याद है अमित की मौत से पहले वो आखिरी बार कहां गया था?”
राहुल ने कहा, “शायद इसी इलाके में।”
समीर चुप हो गया।
“शायद नहीं राहुल… मुझे याद है। अमित उस रात सूरज हवेली गया था।”
राहुल के हाथ से मोबाइल लगभग गिर गया।
तीन साल पहले पुलिस ने बताया था कि अमित अपने दोस्त से मिलने गया था। उसके बाद लौटते समय उसकी कार दुर्घटनाग्रस्त हुई थी।
लेकिन अगर वह सूरज हवेली गया था, तो वहां क्यों?
दोनों उसी शाम हवेली पहुंच गए।
मुख्य दरवाजा जंग लगा हुआ था। अंदर धूल की मोटी परत थी। दीवारों पर पुराने चित्र टंगे थे और हवा में अजीब-सी सीलन थी।
राहुल ने अपनी मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।
सीढ़ियों पर कदमों के निशान दिखाई दिए।
निशान बिल्कुल नए थे।
समीर ने धीरे से पूछा, “यहां कोई आता है क्या?”
राहुल ने जवाब नहीं दिया।
दोनों दूसरी मंजिल पर पहुंचे।
वही खिड़की सामने थी, जो तस्वीर में दिखाई दे रही थी।
राहुल ने खिड़की के पास जाकर देखा।
वहां फर्श पर एक पुराना कैमरा पड़ा था।
राहुल ने कैमरा उठाया।
कैमरा पुराना था, लेकिन उसमें बैटरी लगी हुई थी।
उसने Power बटन दबाया।
स्क्रीन चालू हो गई।
अंदर कुल 27 तस्वीरें थीं।
पहली तस्वीर सूरज हवेली की थी।
दूसरी तस्वीर शहर के पुराने पुल की।
तीसरी तस्वीर एक बंद गोदाम की।
फिर अलग-अलग जगहों की तस्वीरें।
राहुल हर तस्वीर देखता गया।
आखिरी तस्वीर पर पहुंचते ही उसका चेहरा सफेद पड़ गया।
तस्वीर में राहुल खुद दिखाई दे रहा था।
वह सूरज हवेली के अंदर खड़ा था।
लेकिन तस्वीर के पीछे तारीख थी—
“कल।”
समीर ने कैमरा उसके हाथ से छीन लिया।
“ये कैसे हो सकता है?”
राहुल के पास कोई जवाब नहीं था।
उसी समय हवेली के नीचे से दरवाजा बंद होने की आवाज आई।
धड़ाम!
दोनों चौंक गए।
फिर किसी के कदमों की आवाज सुनाई दी।
कोई सीढ़ियों से ऊपर आ रहा था।
एक कदम…
फिर दूसरा…
फिर तीसरा…
राहुल और समीर ने खुद को कमरे के अंदर छिपा लिया।
दरवाजा धीरे-धीरे खुला।
एक आदमी अंदर आया।
काली शर्ट।
सफेद जैकेट।
राहुल की सांस रुक गई।
वह आदमी मुड़ा।
चेहरा देखकर राहुल के पैरों तले जमीन खिसक गई।
वह अमित था।
लेकिन अमित की आंखों में खुशी नहीं थी।
उसने राहुल की तरफ देखकर सिर्फ इतना कहा—
“तुम्हें यहां नहीं आना चाहिए था।”
राहुल कुछ बोल नहीं पाया।
समीर ने कांपती आवाज में पूछा—
“तुम जिंदा हो?”
अमित ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसने मेज पर एक फाइल रखी।
“तीन साल पहले मेरी मौत का नाटक किया गया था।”
राहुल ने फाइल खोली।
उसमें शहर के कई बड़े लोगों के नाम थे।
व्यापारी, अधिकारी और राजनेता।
सभी के सामने रकम और तारीखें लिखी थीं।
अमित ने बताया कि वह एक बड़े आर्थिक घोटाले की जांच कर रहा था। उसे पता चल गया था कि शहर के कुछ प्रभावशाली लोग अवैध पैसों को पुराने कारोबार के जरिए सफेद कर रहे थे।
लेकिन जांच के दौरान अमित को समझ आ गया कि पुलिस के अंदर भी कुछ लोग इस नेटवर्क का हिस्सा हैं।
इसलिए उसने अपनी मौत का नाटक किया और गुप्त रूप से सबूत जमा करता रहा।
“लेकिन तुम्हें तस्वीर कैसे मिली?” राहुल ने पूछा।
अमित कुछ पल चुप रहा।
फिर बोला—
“क्योंकि मैंने ही तुम्हारे कैमरे में वो तस्वीर भेजी थी।”
राहुल हैरान रह गया।
“क्यों?”
“क्योंकि अब मुझे तुम्हारी मदद चाहिए।”
अमित ने बताया कि उसके पास पूरे नेटवर्क के सबूत थे, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण सबूत एक पुराने फोटो स्टूडियो के कंप्यूटर में छिपा था।
वह स्टूडियो कभी उनके पिता चलाते थे।
राहुल को अचानक अपने पिता की पुरानी बातें याद आईं।
पिता अक्सर कहा करते थे—
“कुछ तस्वीरें सिर्फ तस्वीरें नहीं होतीं। उनमें सच छिपा होता है।”
राहुल और अमित उसी रात पुराने स्टूडियो पहुंचे।
कई साल से बंद पड़े स्टूडियो की दीवार पर एक बड़ा पुराना फोटो फ्रेम लगा था।
अमित ने फ्रेम हटाया।
पीछे एक छोटी-सी USB ड्राइव चिपकी हुई थी।
राहुल ने उसे कंप्यूटर में लगाया।
स्क्रीन पर केवल एक फोल्डर था—
“LAST PHOTO”
फोल्डर खोलते ही दर्जनों वीडियो और दस्तावेज सामने आ गए।
सारे सबूत मौजूद थे।
लेकिन तभी कंप्यूटर की स्क्रीन बंद हो गई।
दरवाजे के बाहर कई लोगों की आवाजें सुनाई देने लगीं।
अमित ने राहुल की तरफ देखा।
“वे यहां पहुंच गए हैं।”
दोनों पीछे के दरवाजे से बाहर निकल गए।
कुछ दिनों बाद पुलिस और मीडिया के सामने पूरे मामले के सबूत पेश कर दिए गए।
कई लोगों की गिरफ्तारी हुई।
लेकिन अमित फिर गायब हो गया।
जाने से पहले उसने राहुल से कहा था—
“अगर कभी कैमरे में ऐसी तस्वीर आए जो तुमने खींची ही नहीं… तो उसे नजरअंदाज मत करना।”
एक महीने बाद राहुल फिर अपनी दुकान में बैठा था।
उसने नया कैमरा खरीदा था।
शाम को उसने कैमरे से दुकान की एक सामान्य तस्वीर खींची।
तस्वीर स्क्रीन पर खुली।
राहुल की आंखें अचानक फैल गईं।
तस्वीर में उसकी दुकान के बाहर एक आदमी खड़ा था।
काली शर्ट।
सफेद जैकेट।
अमित।
और तस्वीर के नीचे सिर्फ एक शब्द लिखा था—
“जारी है…”
राहुल ने तुरंत दुकान के बाहर देखा।
वहां कोई नहीं था।
उसने वापस कैमरे की स्क्रीन देखी।
तस्वीर गायब हो चुकी थी।
लेकिन कैमरे की मेमोरी में एक नई फाइल बन चुकी थी—
PHOTO_028
और राहुल समझ गया था…
कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी।
SB Entertainment
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