नवरात्रि की वह आखिरी रात, जब माँ ने दिया एक संकेत
नवरात्रि का सातवाँ दिन था। पूरा शहर रोशनी से जगमगा रहा था। हर तरफ गरबा, ढोल और माँ दुर्गा के जयकारे सुनाई दे रहे थे।लेकिन शहर के बाहर एक पुराना मंदिर ऐसा भी था, जहाँ पिछले पच्चीस सालों से नवरात्रि की सातवीं रात को एक रहस्यमयी घटना होती थी।
लोग कहते थे कि रात के बारह बजे उस मंदिर में अपने आप घंटियाँ बजने लगती थीं। मंदिर के बंद दरवाजे के पीछे से किसी लड़की के रोने की आवाज आती थी।
गाँव के बुजुर्ग हमेशा चेतावनी देते थे—
“नवरात्रि की सातवीं रात उस मंदिर के पास मत जाना। वहाँ जो दिखाई देता है, वह हमेशा सच नहीं होता।”
लेकिन शहर में रहने वाले रोहन को इन बातों पर बिल्कुल विश्वास नहीं था।
गरबा की रात
रोहन अपनी दोस्त नेहा और कुछ साथियों के साथ गरबा खेलने गया था। रात के करीब ग्यारह बजे कार्यक्रम समाप्त हुआ।
सब लोग अपने घर जाने लगे, लेकिन नेहा ने अचानक कहा, “रोहन, मैंने सुना है कि यहाँ पास में एक पुराना दुर्गा मंदिर है। चलो, वहाँ जाकर दर्शन करते हैं।”
रोहन हँस पड़ा।
“इतनी रात को? और उस भूतिया मंदिर में? चलो, आज तुम्हारा डर भी दूर कर देते हैं।”
नेहा को यह बात पसंद नहीं आई, लेकिन दोस्तों के कहने पर वह उनके साथ चल पड़ी।
कुछ देर बाद वे एक सुनसान रास्ते पर पहुँचे। रास्ते के दोनों ओर घने पेड़ थे। दूर मंदिर दिखाई दे रहा था।
अजीब बात यह थी कि मंदिर के आसपास घना अँधेरा था, जबकि पूरे शहर में बिजली और रोशनी थी।
जैसे ही वे मंदिर के पास पहुँचे, अंदर से घंटी बजने की आवाज आई।
टन… टन… टन…
सबके कदम रुक गए।
“अंदर कोई है क्या?” एक दोस्त ने पूछा।
रोहन ने दरवाजे को धक्का दिया। दरवाजा अपने आप खुल गया।
मंदिर के अंदर कौन था?
मंदिर के अंदर माँ दुर्गा की एक विशाल प्रतिमा थी। सामने एक दीपक जल रहा था, जबकि वहाँ कोई पुजारी मौजूद नहीं था।
नेहा ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की।
तभी उसे मंदिर के एक कोने में लाल कपड़े पहने एक छोटी लड़की दिखाई दी।
लड़की दीवार की तरफ मुँह करके खड़ी थी।
नेहा ने धीरे से पूछा, “बेटा, तुम यहाँ अकेली क्या कर रही हो?”
लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया।
रोहन आगे बढ़ा और उसके कंधे पर हाथ रखने ही वाला था कि अचानक मंदिर की सारी घंटियाँ एक साथ बजने लगीं।
लड़की ने धीरे-धीरे अपना सिर घुमाया।
उसका चेहरा देखकर नेहा चीख पड़ी।
उसकी आँखों में आँसू थे और माथे पर खून का एक निशान था।
लड़की ने काँपती आवाज में कहा—
“मुझे बचा लो… वे मुझे फिर से लेने आ गए हैं।”
अगले ही पल मंदिर का दरवाजा जोर से बंद हो गया।
पच्चीस साल पुराना रहस्य
रोहन ने दरवाजा खोलने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं खुला।
तभी मंदिर के पीछे से किसी के चलने की आवाज आई।
एक बूढ़ा पुजारी हाथ में दीपक लिए बाहर आया। उसने लड़की को देखते ही अपनी आँखें बंद कर लीं।
“तुम लोग यहाँ क्यों आए? मैंने कितनी बार कहा था कि इस रात मंदिर में मत आना!”
रोहन ने गुस्से में पूछा, “यह लड़की कौन है?”
पुजारी कुछ देर चुप रहा। फिर उसने बताया कि पच्चीस साल पहले नवरात्रि की सातवीं रात इसी मंदिर में एक छोटी बच्ची गायब हो गई थी।
उस बच्ची का नाम दुर्गा था।
उसकी माँ मंदिर में सेवा करती थी। एक रात अचानक मंदिर में आग लग गई। आग बुझने के बाद उसकी माँ तो मिल गई, लेकिन बच्ची का कोई पता नहीं चला।
गाँव वालों ने उसे मृत मान लिया।
लेकिन उसकी माँ आखिरी साँस तक कहती रही कि उसकी बेटी जीवित है और एक दिन माँ दुर्गा उसे वापस भेजेंगी।
नेहा की आँखों में आँसू आ गए।
“लेकिन यह लड़की तो हमारे सामने खड़ी है!”
पुजारी ने काँपते हुए जवाब दिया—
“क्योंकि आज वही रात है, जब उसका रहस्य खुलने वाला है।”
आखिरी संकेत
अचानक मंदिर की प्रतिमा के सामने रखा दीपक बुझ गया।
चारों तरफ अँधेरा छा गया।
जब रोहन ने अपने मोबाइल की टॉर्च जलाई, तो लड़की वहाँ नहीं थी।
फर्श पर केवल एक लाल चुनरी पड़ी थी।
नेहा ने चुनरी उठाई। उसके अंदर एक पुरानी तस्वीर थी। तस्वीर में एक महिला अपनी छोटी बेटी को गोद में लेकर खड़ी थी।
तस्वीर के पीछे लिखा था—
“मेरी दुर्गा लौटकर आएगी। माँ का वचन कभी खाली नहीं जाता।”
तभी मंदिर के बाहर से एक महिला की आवाज आई—
“दुर्गा… मेरी बच्ची!”
सब लोग बाहर भागे।
मंदिर की सीढ़ियों पर एक बूढ़ी महिला खड़ी थी। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।
नेहा ने तस्वीर उसकी तरफ बढ़ाई।
महिला तस्वीर देखते ही जमीन पर बैठ गई।
“यह मेरी बेटी है… मेरी दुर्गा!”
उसने मंदिर की प्रतिमा की ओर हाथ जोड़कर कहा, “माँ, आपने मेरा वचन पूरा कर दिया।”
उसी क्षण मंदिर की घंटियाँ फिर बजने लगीं।
और मंदिर के भीतर से एक छोटी बच्ची की हँसी सुनाई दी।
लेकिन जब सबने पीछे मुड़कर देखा, तो वहाँ कोई नहीं था।
अचानक मंदिर की प्रतिमा के सामने रखा दीपक बुझ गया।
चारों तरफ अँधेरा छा गया।
जब रोहन ने अपने मोबाइल की टॉर्च जलाई, तो लड़की वहाँ नहीं थी।
फर्श पर केवल एक लाल चुनरी पड़ी थी।
नेहा ने चुनरी उठाई। उसके अंदर एक पुरानी तस्वीर थी। तस्वीर में एक महिला अपनी छोटी बेटी को गोद में लेकर खड़ी थी।
तस्वीर के पीछे लिखा था—
“मेरी दुर्गा लौटकर आएगी। माँ का वचन कभी खाली नहीं जाता।”
तभी मंदिर के बाहर से एक महिला की आवाज आई—
“दुर्गा… मेरी बच्ची!”
सब लोग बाहर भागे।
मंदिर की सीढ़ियों पर एक बूढ़ी महिला खड़ी थी। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।
नेहा ने तस्वीर उसकी तरफ बढ़ाई।
महिला तस्वीर देखते ही जमीन पर बैठ गई।
“यह मेरी बेटी है… मेरी दुर्गा!”
उसने मंदिर की प्रतिमा की ओर हाथ जोड़कर कहा, “माँ, आपने मेरा वचन पूरा कर दिया।”
उसी क्षण मंदिर की घंटियाँ फिर बजने लगीं।
और मंदिर के भीतर से एक छोटी बच्ची की हँसी सुनाई दी।
लेकिन जब सबने पीछे मुड़कर देखा, तो वहाँ कोई नहीं था।
कहानी का अंत
अगली सुबह गाँव वालों ने मंदिर के बाहर एक नया दीपक जलता हुआ देखा।
पुजारी ने बताया कि पच्चीस साल बाद पहली बार मंदिर का बंद दरवाजा अपने आप खुला था।
रोहन और नेहा ने उस रात के बारे में किसी से ज्यादा बात नहीं की।
लेकिन नेहा के पास आज भी वह लाल चुनरी सुरक्षित रखी है।
कहते हैं कि हर नवरात्रि की सातवीं रात, ठीक बारह बजे, उस पुराने मंदिर में एक दीपक अपने आप जल उठता है।
और मंदिर की घंटियों के बीच एक आवाज सुनाई देती है—
“जहाँ सच्ची श्रद्धा होती है, वहाँ माँ अपने भक्तों का साथ कभी नहीं छोड़तीं।”
जय माता दी!
अगली सुबह गाँव वालों ने मंदिर के बाहर एक नया दीपक जलता हुआ देखा।
पुजारी ने बताया कि पच्चीस साल बाद पहली बार मंदिर का बंद दरवाजा अपने आप खुला था।
रोहन और नेहा ने उस रात के बारे में किसी से ज्यादा बात नहीं की।
लेकिन नेहा के पास आज भी वह लाल चुनरी सुरक्षित रखी है।
कहते हैं कि हर नवरात्रि की सातवीं रात, ठीक बारह बजे, उस पुराने मंदिर में एक दीपक अपने आप जल उठता है।
और मंदिर की घंटियों के बीच एक आवाज सुनाई देती है—
“जहाँ सच्ची श्रद्धा होती है, वहाँ माँ अपने भक्तों का साथ कभी नहीं छोड़तीं।”
जय माता दी!
कहानी से सीख
श्रद्धा केवल चमत्कार की उम्मीद करना नहीं है, बल्कि विश्वास, करुणा और सच्चाई के रास्ते पर चलना भी है। नवरात्रि हमें बुराई पर अच्छाई की जीत और माँ दुर्गा की शक्ति का स्मरण कराती है।
SB Entertainment

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